सामाजिक आंदोलन: अर्थ, परिभाषा और विशेषताएँ

सामाजिक आंदोलन: अर्थ, परिभाषा और विशेषताएँ ( Samajik Andolan Arth Paribhasha aur Visheshtayen )

Explain the definition and main features of social movement

सामाजिक आन्दोलन, सामूहिक व्यवहार का एक स्वरूप है । यह सामाजिक उद्विकास , प्रगति और विकास की भांति ही परिवर्तन का एक ढंग भी है । सामाजिक आन्दोलन का सम्बन्ध सामाजिक व्यवस्था के विरोध से अधिक है जिसका संचालन समाज तथा संस्कृति में नवीन परिवर्तन लाने अथवा नवीन परिवर्तनों का विरोध करने के लिए होता है । इसका उद्देश्य सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक व राजनीतिक क्षेत्रों में आंशिक अथवा आमूल - चूल परिवर्तन लाना होता है । भारत में ब्रह्म समाज , आर्य समाज , तथा रामकृष्ण मिशन द्वारा चलाए गए आन्दोलनों का उद्देश्य धार्मिक एवं सामाजिक क्षेत्रों में परिवर्तन एवं सुधार लाना था ।
सामाजिक आंदोलन अर्थ, परिभाषा और विशेषताएँ

सामाजिक आन्दोलन का अर्थ एवं परिभाषा ( Samajik Andolan ki Arth Evam Paribhasha )

किसी भी समाज के बीच सामाजिक आन्दोलन तब पैदा होते हैं जब वहाँ के लोग वर्तमान स्थिति से असन्तुष्ट हों और उसमें परिवर्तन लाना चाहते हों । कभी - कभी सामाजिक आन्दोलन किसी परिवर्तन का विरोध करने के लिए भी आयोजित किए जाते हैं । सामाजिक आन्दोलन के पीछे एक विचारधारा होती है । प्रारम्भ में सामाजिक आन्दोलन का असंगठित एवं अव्यवस्थित रूप धीरे - धीरे संगठित एवं व्यवस्थित रूप धारण कर लेता है ।

सामाजिक आन्दोलन के एक सामूहिक व्यवहार होने के कारण कॉम्टे , दुखींम , लीवा एवं टार्डे आदि की रुचि इसमें अधिक रही । हार्टन एवं हण्ट ने सामाजिक आन्दोलन को परिभाषित करते हुए लिखा " सामाजिक आन्दोलन समाज अथवा उसके सदस्यों में परिवर्तन लाने अथवा उसका विरोध करने का सामूहिक प्रयास है । " हर्बर्ट ब्लूमर के अनुसार “ सामाजिक आन्दोलन जीवन की एक नई व्यवस्था को स्थापित करन के लिए सामूहिक प्रयास कहा जा सकता है । "

कैमरॉन के शब्दों में “ सामाजिक आन्दोलन तब होते हैं जब एक बड़ी संख्या में लोग विद्यमान संस्कृति या सामाजिक व्यवस्था के किसी भाग को परिवर्तित करने अथवा उसके स्थान पर दूसरी को स्थापित करने के लिए एक साथ बँध जाते हैं । " 

उपर्युक्त परिभाषा से स्पष्ट है कि सामाजिक आन्दोलन का उद्देश्य समाज अथवा संस्कृति में कोई आंशिक अथवा पूर्ण परिवर्तन लाना अथवा परिवर्तन का विरोध करना होता है ।

सामाजिक आन्दोलन की विशेषताएं ( Samajik Andolan ki Visheshtaen )

सामाजिक आन्दोलन की विशेषताएँ सामाजिक आन्दोलन की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख संक्षेप में निम्नवत् किया जा सकता है
( 1 ) सामूहिक प्रयास 
सामाजिक आन्दोलन की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि यह एक सामूहिक प्रयास होता है । सामाजिक आंदोलन के सदस्य परिवर्तन लाने के लिए सामूहिक रूप से प्रयास करते हैं । 

( 2 ) वैचारिक आधार
सामाजिक आन्दोलन की सामाजिक आन्दोलन के सदस्य एक विशेषता यह भी है कि इनका निश्चित उद्देश्य एवं लक्ष्य अवश्य होता है । वैचारिक आधार आन्दोलन को संगठित एवं गतिशील करने का प्रयास करता है । वैचारिक आधार ही आन्दोलन करने वालों को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास करता है ।
( 3 ) संगठन
सामाजिक आन्दोलन की प्रमुख विशेषता औपचारिक संगठन है । इस संगठन के द्वारा ही आन्दोलन के कार्यक्रमों का निर्धारण हुआ है और उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है । सामूहिक प्रयास के द्वारा औपचारिक संगठन विकसित होता है ।

( 4 ) स्वीकृत आन्दोलन
आन्दोलन के द्वारा स्वीकृत नेतृत्व का विकास होता है । कुशल नेता आन्दोलन को गति प्रदान करता है और अपने सदस्यों की आशा एवं आकांक्षा की पूर्ति सामूहिक रूप से करने का प्रयास करता है । 

( 5 ) विकास
किसी भी सामाजिक आन्दोलन की रचना एवं संगठन पहले से ही विकसित नहीं होता है , वरन् यह अपने जीवन काल में विकसित होते हैं । सामाजिक आन्दोलन जब धीरे - धीरे विकसित होते हैं , तब संगठित एवं ठोस रूप ग्रहण कर लेते हैं । आरम्भ में उत्तेजना या अशान्ति आन्दोलन को जन्म देती है । तत्पश्चात् उत्तेजना का उद्देश्य जनता को उत्तेजित करने उसे आन्दोनल में भाग लेने के लिए प्रेरित करना होता है । 

डासन ( Dawson ) एवं गेटिस ( Gettys ) आन्दोलन के विकास के चार चरणों का उल्लेख किया है— 

  • ( 1 ) सामाजिक असन्तोष, 
  • ( 2 ) जन उत्तेजना , 
  • ( 3 ) स्वरूप ग्रहण करना एवं 
  • ( 4 ) संस्थीकरण ।
( 6 ) नियोजित प्रयास
सामाजिक आन्दोलन के विकास के लिए केवल उत्तेजना अथवा अशान्ति ही आवश्यक नहीं है । वरन् नियोजित रूप से सामूहिक प्रयास द्वारा आन्दोलन को गति प्रदान की जाती है । 

( 7 ) परिवर्तन उद्देश्य
सभी प्रकार के सामाजिक आन्दोलनों का उद्देश्य परिवर्तन लाना होता है । वर्तमान सामाजिक व्यवस्था एवं सामाजिक मूल्यों में सम्पूर्ण परिवर्तन अथवा आंशिक परिवर्तन लाना होता है । समाज का एक वर्ग परिवर्तन यथास्थितिवादी होता है , उसके द्वारा परिवर्तन का विरोध किया जाता है , उस विरोध का प्रतिरोध का विरोध किया जाता है और परिवर्तन द्वारा उद्देश्य को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है । 
( 8 ) संकट अथवा समस्या
किसी भी सामाजिक आन्दोलन का विकास तभी होता है , जब कोई संकट या समस्या में विकसित होती है । उस संकट या समस्या के समाधान के लिए ही सामाजिक आन्दोलन का विकास होता है । 

( 9 ) सुनिश्चित दिशा
सामाजिक आन्दोलन के द्वारा जिस परिवर्तन की दिशा को अपनाया जाता है , वह दिशा सुनिश्चित होती है अर्थात् पुरानी व्यवस्था के स्थान पर जो नई व्यवस्था लाने का प्रयास किया जाता है , उस परिवर्तन की दिशा सुनिश्चित होती है ।

सामाजिक आन्दोलन के उत्तर मार्क्सवादी दृष्टिकोण विवेचना

मार्क्स की वर्ग - रचना , वर्ग - संघर्ष , सामाजिक जीवन को निर्धारित करने में अर्थव्यवस्था की निर्णायक भूमिका , अधिसंरचना और अधोसंरचना , ऐतिहासिक भौतिकवाद , द्वन्द्वात्मक प्रणाली सम्बन्धी विचारों की घोर आलोचना हुई है । यही नहीं , इन अवधारणाओं सम्बन्धी मार्क्स के विचार तथाकथित

मार्क्सवादियों में भी विवादास्पद रहे हैं । कुछ ने इनमें संशोधन सुझाये हैं , तो कुछ अन्य व्यक्तियों ने बदले हुए सन्दर्भ में इनके पुनर्विवेचना , पुनर्व्याख्या और समीक्षा की माँग की है । मार्क्स के विचारों की पुनर्विवेचना और संशोधन की माँग करने वाले विद्वानों का समूह ही ' नव मार्क्सवादियों ' के नाम से जाना जाता है जिनमें अल्ब्यूजर , हेबरमाँ , होरखीमर और लुकाक्स के नाम उल्लेखनीय हैं ।

अपनी पुस्तक ' रीडिंग केपिटल ' में अल्थ्यूजर और उनके साथियों ने मार्क्स के इतिहास और समाज के बाद दृष्टिकोण ( प्रौढ़ मार्क्स ) के सन्दर्भ में मार्क्स की मुख्य अवधारणाओं की शल्य चिकित्सा की है । आर्थिक संरचना , अथवा ‘ उत्पादन के ढंग ' का विश्लेषण कुछ तत्त्वों के समूह ( श्रम के साधन , वे वस्तुएँ जिन पर कार्य किया जाता है , श्रमिक और वर्ग समाजों में ऐसे मालिक जो काम नहीं करते हैं ) के ऐसे समन्वय के रूप में किया है जो दो भिन्न प्रकार के सम्बन्धों से होते हैं ; 
( 1 ) उत्पादन के कार्य के लिये आवश्यक सम्बन्ध , 
( 2 ) मालिकान सम्बन्ध जिनके द्वारा मालिकों का वर्ग अतिरिक्त सम्पदा को प्राप्त करता है । इन सम्बन्धों के विश्लेषण में अल्ब्यूजरवादियों ने बहुत कुछ वही बात कही हैं , जो रूढ़िवादी मार्क्सवादी ने कही है । इन दोनों प्रकार के विचारकों में जो अन्तर दिखाई देता है , वह ' आर्थिक निर्धारणवाद ' की धारणा कोर लेकर है । अल्ब्यूजरवादियों ने स्पष्ट तौर पर ' आर्थिक निर्धारणवाद ' को नकारा है । वे कहते हैं कि सम्पूर्ण समाज कुछ विशिष्ट ' संरचनाओं ' अथवा ' व्यवहारों ' ( प्रैक्टिसेस ) से बना होता है , जिनमें से अर्थव्यवस्था भी एक है ।

व्यवहार के अन्य रूप वैचारिक , राजनीतिक और सैद्धान्तिक ( वैज्ञानिक ) आदि होते हैं । इनमें से प्रत्येक व्यवहार का अपना एक यथार्थ , अपने , ' अन्तर्विरोध ' होते हैं ( जैसे विद्यार्थियों और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच संघर्ष या महिलावादी आन्दोलन के रूप में वैचारिक संघर्ष ) । ये सभी अपने - अपने ढंग से सामाजिक प्रक्रियाओं के बहाव को बनाये रखने में अपना योगदान करते हैं ।

अतः अल्ब्यूजर ने समाज की रचना और संचालन में आर्थिक प्रक्रिया ( अर्थव्यवस्था ) को रूढ़िवादी मार्क्सवादियों की भाँति एक मात्र या सर्वोपरि प्रक्रिया न मानकर अन्य प्रक्रियाओं के साथ एक प्रक्रिया माना है , किन्तु उन्होंने मार्क्स के इस विचार से अवश्य सहमति प्रकट की है कि आर्थिक संरचनाएँए कुछ अंशों में मूलभूत होती हैं । इनकी महत्ता अन्य प्रक्रियाओं से थोड़ी अधिक होती है । 

अल्ब्यूजर के अनुसार , मार्क्स का सबसे बड़ा योगदान इतिहास में सर्वप्रथम उनकी ' उत्पादन के ढंग ' और विशेष रूप में ' पूँजीवादी उत्पादन के ढंग ' ( अतिरिक्त मूल्य , विनिमय मूल्य और अन्य ( कमोडिटी की धारणाएँ ) से जुड़ी अवधारणाएँ है । ' इतिहास के विज्ञान ' की खोज उनकी दूसरी प्रमुख अवधारणा है । ' इतिहास के विज्ञान ' से तात्पर्य ' ऐतिहासिक भौतिकवाद के साथ - साथ द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद ' से है । ' ऐतिहासिकतावाद , इसके विपरीत , यह भूला देता है कि मार्क्सवाद एक दर्शन भी है और मानवतावाद यह भूला देता है कि मार्क्स ने एक नये विज्ञान को जन्म दिया है । जिसे हम ' इतिहास का विज्ञान ' कहते हैं , उसे उत्पादन के ढंग के इतिहास के रूप में समझा जाना चाहिये ।

अतः मार्क्स की दृष्टि में ' समाज ' जैसी कोई चीज नहीं है , अपितु ये उत्पादन के विभिन्न ढंग ही हैं जो इतिहास में उद्भुत होते रहते हैं और जो संरचित सामाजिक समष्टि के अपेक्षाकृत विभिन स्वतन्त्र स्तों में हमेशा विद्यमान रहते हैं । हेबरमॉ कहते हैं कि पूँजीवाद के विस्तार के साथ राज्य तन्त्र और अधिकारी तन्त्र ( नौकरशाही ) का विकास और विस्तार हुआ है जिसके कारण मानव की स्वतन्त्रता का हनन हुआ और वह अधिकाधिक पराधीन होता चला गया । 
हेमरमा
मानव के दमन और शोषण के लिये आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी को उत्तरदायी मानते हैं । विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बारे में उनके विचार विरोधाभासी हैं । एक ओर वे विज्ञान को प्राकृतिक नियमों की खोज के लिये आवश्यक मानते हैं । यही नहीं , पर्यावरण और प्रौद्योगिकीय नियन्त्रण के लिये विज्ञान की उपयोगिता को भी स्वीकार करते हैं , किन्तु जब इसी प्रौद्योगिकीय नियन्त्रण का प्रयोग आर्थिक और राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिये होता है , तब वे इसे शोषण और दमन का हथियार मानते हैं जिसकी हेबरमों ने तीव्र आलोचना की है ।
हेमरमॉ
ने आधुनिक पूँजीवादी समाज में वैधकरण की समस्या का भी सूक्ष्म एवं सारगर्भित विश्लेषण किया है । उनके अनुसार , पूँजीवादी समाज पूर्णतः विरोधाभासों , संकटों और विकृत ज्ञान से भरा हुआ है । इस प्रकार के विचार हेबरमों ने अपनी पुस्तक “ वैधकरण का संकट " ( लेजिटीमेशन क्राइसिस , 1976 ) में व्यक्त किये हैं ।

उन्होंने लिखा है कि उन्नत पूंजीवाद अब ' शुद्ध ' आर्थिक या प्रणाली संकट को उत्पन्न नहीं करता क्योंकि राज्य ने अर्थव्यवस्था से सम्बन्धित अनेक नियन्त्रणात्मक कार्य अपने हाथ में ले लिये हैं । फिर भी , राज्य का हस्तक्षेप विरोधी आवश्यकताओं को सन्तुलित करने में अक्षम रहा है । इन विरोधी आदेशों का जन्म एक ऐसी अर्थव्यवस्था के मूलभूत विरोधों से होता जिसके क्रिया - कलाप आधिकाधिक समाजवादी होते हैं , किन्तु जो निरन्तर निजी हितों की पूर्ति करते रहते हैं अतः हेबरमों की दृष्टि में पूँजीवादी उत्पादन व्यवस्था की मूलभूत संकट प्रवृत्तियाँ , जिनका विवेचन मार्क्स ने किया है , वे आज भी यथावत विद्यमान हैं ।

हेबरमों की प्रारम्भिक कृतियों में इस तथ्य पर भी प्रकाश डाला गया है कि आधुनिक राज्य किस प्रकार पूँजीवाद की उपज है तथा किस प्रकार ये पूँजीवाद को जिन्दा रखने का कार्य करते हैं । मार्क्सवाद के पूर्ण रूप से धराशाई होने की बात करने वाले मानते हैं कि पूँजीवाद से समाजवाद में रूपान्तरण की मार्क्सवाद की प्रयोजन की मृत्यु हो चुकी है , क्योंकि यह प्रयोजना स्पष्ट तौर पर अपने उद्देश्यों को हासिल करने में असफल रही है । 
इन विचारकों ने अपने मत की पुष्टि में निम्नलिखित तर्क दिये 
  • ( 1 ) कामगार वर्ग पहले से अधिक गरीब नहीं हुआ है , 
  • ( 2 ) वर्ग - संरचना स्पष्ट तौर पर दो वर्गों ( बुर्जुआ और सर्वहारा ) में नहीं बँटी 
  • ( 3 ) विनिर्माण की प्रक्रिया में बदलाव के कारण औद्योगिक मजदूरी की संख्या घट गई है , या दिन - प्रतिदिन घटती जा रही है । कामगार वर्ग में अधिक बिखराव आ गया है तथा अपनी पतनोन्मुखी दशा के प्रति उनकी चेतना कमजोर पड़ गई है , 
  • ( 4 ) कामगार ( श्रमिक ) वर्ग की कुल मिलाकर संख्या में कमी होने के कारण उनकी शक्ति , वर्ग - चेतना और वर्ग संघर्ष की क्षमता में घटोत्तरी हुई है , 
  • ( 5 ) मजदूर लोग अब अपने आपको मजदूर कहलाना पसन्द नहीं करते । अब उनकी पहचान के अनेक आधार बन गये है । उपरोक्त कारणों के आधार पर एरॉन्सन रूढ़िवादी मार्क्सवाद को समाप्त हुआ मानते हुए कहते हैं कि हमें इसके अस्तित्व के बारे में दुखी नहीं होना चाहिये । फिर भी , मार्क्सवाद याद किया जायेगा क्योंकि " मार्क्सवाद ने एक आशा दी , इसने विश्व को एक अनुभूति दी ; इसने अनेक और अगणित जीवन को दिशा और अर्थ प्रदान किया है । मार्क्सवाद न केवल यथार्थ संसार में असफल हुआ , अपितु सिद्धान्त के क्षेत्र में भी मार्क्सवाद को कई नये सिद्धान्तों से मार खानी पड़ी है । सर्वाधिक मार इस सिद्धान्त पर नये उभरते हुए महिलावादी सिद्धान्त की पड़ी ।
महिलावादी सिद्धान्त ने
स्त्रियों के शोषण और उत्पीड़न को स्त्रियों के नजरिये से देखने पर जोर दिया । इसी प्रकार , समाज के अन्य उत्पीड़ित समूहों ( अल्पसंख्यक समूह , वृद्धजन , समूह ) ने अपनी - अपनी आवाज उठाकर मार्क्सवादी कामगार एकता की धारणा को गहरी ठेंस पहुँचा कर इसे नष्ट कर दिया । एरॉन्सन ने उत्तर मार्क्सवादी सिद्धान्तों के चरित्र पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि ' मार्क्सवाद से रहित कई प्रकार के मार्क्सवाद हैं ।

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